देशभर के 100 शहरों में पटना शामिल, बिहारशरीफ से भी पिछड़ा मुजफ्फरपुर और भागलपुर

वर्ष 2016 से बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू है. यह कानून राज्य में तब लागू किया गया था जब सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) की जेडीयू लालू यादव की आरजेडी के साथ थी. दोनों ही बड़े सियासी दलों ने बिहार में इस कानून का इंप्लीमेंटेशन करवाने में अहम भूमिका निभाई थी. बाद दिनों में वर्ष 2017 में जब आरजेडी और जेडीयू (RJD and JDU) की सियासी राह अलग हुई तो यही शराबबंदी राजद के लिए राजनीति का मुद्दा भी बन गई. कांग्रेस समेत अन्य पॉलिटिकल पार्टियां इसके मुद्दा बनाकर अक्सर सियासी बहस के केंद्र में ले आती हैं. अब जीतन राम मांझी ने इसे मुद्दा बनाया है और इसपर उनकी राहें भी सीएम नीतीश कुमार के आधिकारिक कदम से दूर नजर आ रही है.

दरअसल, बिहार में शराबबंदी के मुद्दे पर एनडीए में शामिल हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी शराबबंदी कानून के खिलाफ खड़े हो गए हैं. मांझी ने एक बार फिर कहा है कि शराब पीने में कोई बुराई नहीं है. सीमित मात्रा में शराब पीना सेहत के लिए अच्छा है. बता दें कि मांझी ने यह बात जान-बूझकर कही है क्योंकि ये सभी जानते हैं कि सीएम नीतीश ने यह ऐलान किया है कि जब तक वे मुख्यमंत्री रहेंगे बिहार में शराबबंदी कानून लागू रहेगा. जाहिर है मांझी के दिए इस बयान के राजनीतिक मायने भी हैं इसलिए ही शायद 29 जून को दिए इस बयान के बाद भी नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

शराब का नशा सिर चढ़कर बोलेगा!

सरसरी तौर पर तो यह माना जा रहा है कि केंद्र में होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार से पहले मांझी गठबंधन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इसी क्रम में उन्होंने दिल्ली में भाजपा के आला नेताओं से बात भी की है. कहा जा रहा है कि मांझी बिहार सरकार में अपनी पार्टी के लिए और ज्यादा हिस्सेदारी चाहते हैं. इसी बीच 5 जुलाई को लालू यादव के पटना लौटने की खबरें आ रही हैं, ऐसे में मांझी के बयान का मतलब तो जरूर कुछ है. तो क्या मांझी के इस बयान का कनेक्शन सीधे लालू के पटना लौटने और आगामी सियासी समीकरण की कवायद से जुड़ता है.

मांझी और शराब! क्या हैं सियासी मायने?

राजनीति के जानकार बताते हैं कि शराब के पक्ष में दिया गया मांझी का बयान सीधे नीतीश कुमार की मर्जी के खिलाफ बयान है. अब तक मांझी गठबंधन के सहयोगी भाजपा के खिलाफ ही खुलकर बयान देते देखे गए हैं, लेकिन अब नीतीश कुमार के खिलाफ खुल कर बोल पड़े हैं. यह भी माना जा रहा है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के जेल से निकलने के बाद बिहार के बदले सियासी समीकरण को मांझी अच्छी तरह से भांप गए हैं और वह सरकार पर दबाव बनाकर दोनों तरफ अपने लिए संभावनाओं के द्वार खुले रखना चाहते हैं.

कांग्रेस को भी भा गई मांझी के ‘नशे की बात’!

इसके सियासी मायने ऐसे भी समझ सकते हैं कि कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने अपनी ओर से भी सियासी तीर छोड़ दिए हैं. उन्होंने कहा कि बिहार एनडीए में सहयोगी दल काफी असहज महसूस कर रहे हैं. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रमुख जीतन राम मांझी और वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी की असहजता कई बार दिख चुकी है. उन दोनों को चाहिए कि महागठबंधन में शामिल होकर बिहार में एक साफ-सुथरी सरकार बनवाएं और शराबबंदी कानून के तहत झूठे मामलों में फंसाकर जेल भेजे गए हजारों लोगों को जेल से निकलवाने में मदद करें.

नशे के सौदे का एक सबब यह भी है…

बता दें कि वर्ष 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साफ-साफ कहा था कि शराब पीने का शौक रखने वाले बिहार न आएं. तब कई आर्थिक विशेषज्ञों ने कहा था कि सीएम नीतीश बड़ी भूल कर रहे हैं. इससे 4000 करोड़ रुपए सालाना घाटा उठाना पड़ेगा. हालांकि मुख्यमंत्री अपने फैसले पर अडिग रहे. हालांकि कई जानकार कहते हैं कि जब यह लागू किया गया था तब बिहार का राजस्व घाटा प्रतिवर्ष 3000 से 4000 करोड़ अनुमानित था, जो कि अब 8000 करोड़ से अधिक का हो गया है. बावजूद इसके यह अच्छी पहल थी और इससे समाज में बेहतरी हुई है. लेकिन समय-समय पर इसमें संशोधन की मांग उठती है, जिसे समझा जाना चाहिए.

सत्ता-समीकरण में चढ़ा शराब का सुरूर तो बदल जाएगी स्टोरी!
सत्ता सियासत का समीकरण भी कुछ ऐसा है कि नशा कब चढ़ जाए और इसी सुरूर में कब कदम बहक जाएं कोई नहीं जानता. दरअसल बिहार एनडीए के पाले में बीजेपी के 74, जेडीयू के 43, मांझी के हम के 4, साहनी की वीआइपी के 4 और एक निर्दलीय यानी कुल 127 का समर्थन है. वहीं, महागठबंधन के पास राजद के 75, कांग्रेस के 19 और वाम दलों के 16 सहित टोटल 110 का आंकड़ा है. इसमें ओवैसी की एआईएआईएम के 5 विधायकों का बाहर से समर्धन होने पर कुल 115 तक पहुंच जाता है. अब बिहार विधानसभा की 243 सीटों में बहुमत का आंकड़ा 122 होता है, ऐसे में मांझी-सहनी पर सियासी सुरूर चढ़ने भर की देर है. अगर ऐसा हुआ तो 115 +4+4 यानी आंकड़ा 123 तक पहुंच जाएगा

क्या मांझी पर चढ़ेगा सत्ता की सियासत का नशा?

बहरहाल तमाम सवालों के बीच अब एक बार फिर बिहार में पूर्ण शराबबंदी का मुद्दा एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गया है. इस बार इसे लाने वाले सीएम नीतीश कुमार से गलबहियां करने वाले जीतन राम मांझी हैं. हालांकि उनका शराबबंदी को लेकर यह स्टैंड पहले भी उभरकर सामने आता रहा है, लेकिन इस बार शराबबंदी का मुद्दा बिहार में सियासी मायने लेकर आया है. कहा जा रहा है कि कहीं इसी शराब के बहाने सत्ता-सियासत का नशा ऐसा न चढ़े कि इसी आधार पर बिहार में एक बार फिर सत्ता के बदलाव की कहानी लिख दी जाए. बहरहाल मांझी को शराब क्यों पसंद है इसका जवाब भी आने वाले समय में जरूर मिलेगा.

Input: news 18




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