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आज का शब्द: बज्र और दिनेश कुमार शुक्ल की कविता- विलोम की छाया – News 2022

गकुल-संकुलता के भीतर से औचक ही
बहुत दिनों के बाद एक दिन जाने कैसे
बज्र फोड़ती मर्म भेदती
कठफोड़वा की टाक – ठकाठक लगी गूँजने,
लगी गूँजने जैसे
श्रम के सहज तर्क की टक्कर, सीधी टक्कर !
वर्तमान में सेंध लगाते कठफोड़वा के पीछे-पीछे
मैं भी घुसता गया
अगम के तरु – कोटर में —
मैने देखा साम-दाम को, दण्ड-भेद को
गुर्दों के बाजार भाव पर चर्चा करते,
नया धर्म देकर बच्चों को
दिल्ली की मेमों के घर में बर्तन धोने
झुण्ड बना कर बेच रहे थे धर्म प्रचारक,
देखा मैने स्वप्नों को भी दुःस्वप्नों से हाथ मिलाते,
दैत्याकार तितलियों को देखा मैने जीवन रस पीते
मैने बीते हुए समय के मलबे में
भविष्य को देखा-किसी अजीब बनस्पति के सूखे अंकुर-सा

मैने खुद को भी अपने विलोम में देखा

देखा मैने अमर सत्य को झूठ बोलते

स्याही सूख नहीं पाती थी शब्द निरर्थक हो जाते थे

इतनी क्षणभंगुर भाषा थी,

मैने देखा वंचित लोगों को वंचक पर फूल चढ़ाते ….


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